Joshimath Landslide: जोशीमठ में कैसे धंस रहे हैं घर-सड़क, देश की सुरक्षा के लिए क्यों है ये खतरे की घंटी?

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जोशीमठ

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– फोटो : Amar Ujala

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उत्तराखंड के जोशीमठ में हो रहे भू-धंसाव से स्थिति लगातार बिगड़ रही है। भू-धंसाव ने क्षेत्र के सभी वार्डों को चपेट में ले लिया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पीएमओ लगातार मामले की निगरानी कर रहा है। अब तक 70 परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया जा चुका है।  
तेजी से हो रहे भू-धंसाव का दायरा भारत-तिब्बत सीमा को ओर बढ़ने लगा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भू-धंसाव की घटना पर जल्द ही प्रभावी रोक नहीं लगी तो ये देश की सुरक्षा को भी खतरा पैदा कर सकता है। 

आखिर जोशीमठ कहां स्थित है? जोशीमठ में भू-धंसाव का मामला क्यों चर्चा में आया है? किन कारणों से भू-धसांव हो रहा है? क्या भू-धंसाव को लेकर कोई चेतावनी थी? आगे इसका खतरा और दायरा कितना बढ़ सकता है? आइये जानते हैं…

 
जोशीमठ कहां स्थित है? 
‘गेटवे ऑफ हिमालय’ के नाम से मशहूर जोशीमठ, जिसे ज्योतिर्मठ के नाम से भी जाना जाता है, उत्तराखंड के चमोली जिले में एक शहर और एक नगरपालिका बोर्ड है। यह 6150 फीट (1875 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है जो बद्रीनाथ जैसे तीर्थ केंद्रों का प्रवेश द्वार भी है। यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से एक है। धार्मिक, पौराणिक और एतिहासिक शहर होने के साथ ही यह इलाका सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। यहां से भारत-तिब्बत सीमा महज 100 किलोमीटर दूर है। हेमकुंड साहिब, औली, फूलों की घाटी आदि स्थानों पर जाने के लिए यात्रियों को इसी जोशीमठ से होकर गुजरना पड़ता है।

जोशीमठ में क्या अचानक भू-धंसाव की हो रहा है?
भू-धंसाव की ये घटनाएं अचानक नहीं हो रही हैं। जोशीमठ लंबे अरसे से धंस रहा है। इस भू-धंसाव को लेकर स्थानीय लोगों की जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति पिछले कई वर्षों से आंदोलन कर रही है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 2006 में वरिष्ठ भूस्खलन वैज्ञानिक डॉक्टर स्पप्नामिता चौधरी ने जोशीमठ का अध्ययन किया था। उन्होंने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट शासन और आपदा प्रबंधन विभाग को सौंपी थी। रिपोर्ट का क्या हुआ, इस संबंध में उन्हें भी जानकारी नहीं है। 
भू-धंसाव का मामला अभी क्यों चर्चा में आया है?
सोमवार रात कई मकानों में जब अचानक बड़ी दरारें आ गईं, तो पूरे नगर में भय फैल गया। ये दरारें हर दिन बढ़ रही हैं। मारवाड़ी वार्ड में स्थित जेपी कंपनी की आवासी कॉलोनी के कई मकानों में दरारें आ गईं। कॉलोनी के पीछे पहाड़ी से रात को ही अचानक मटमैले पानी का रिसाव भी शुरू हो गया। दरार आने से कॉलोनी का एक पुश्ता भी ढह गया। साथ ही बद्रीनाथ हाईवे पर भी मोटी दरारें आईं। वहीं तहसील के आवासीय भवनों में भी हल्की दरारें दिखीं। भू-धंसाव से ज्योतेश्वर मंदिर और मंदिर परिसर में दरारें आ गई हैं। 
सिंहधार वार्ड में बहुमंजिला होटल माउंट व्यू और मलारी इन जमीन धंसने से तिरछे हो गए। स्थानीय लोगों के मुताबिक सोमवार रात करीब 10 बजे होटल की दीवारों से चटकने की आवाज आनी शुरू हो गई जिससे इन होटलों के पीछे रहने वाले पांच परिवारों के लोग दहशत में आ गए। 
इस भू-धसांव की वजह क्या है? 
जोशीमठ में भू-धंसाव का कारण बेतरतीब निर्माण, पानी का रिसाव, ऊपरी मिट्टी का कटाव और मानव जनित कारणों से जल धाराओं के प्राकृतिक प्रवाह में रुकावट को बताया गया। भूस्खलन वैज्ञानिक डॉक्टर स्पप्नामिता चौधरी कहते हैं कि पिछले दो दशक में जोशीमठ का अनियंत्रित विकास हुआ है। बारिश और पूरे साल घरों से निकलने वाला पानी नदियों में जाने के बजाय जमीन के भीतर समा रहा है। यह भू-धंसाव का प्रमुख कारण है। धौलीगंगा और अलकनंदा नदियां विष्णुप्रयाग क्षेत्र में लगातार टो कटिंग (नीचे से कटाव) कर रही हैं। इस वजह से भी जोशीमठ में भू-धंसाव तेजी से बढ़ा है। चौधरी कहते हैं 2013 में आई केदारनाथ आपदा, 2021 की रैणी आपदा, बदरीनाथ क्षेत्र के पांडुकेश्वर में बादल फटने की घटनाएं भी भू-धंसाव के काफी हद तक जिम्मेदार हैं। 
क्या भू-धंसाव को लेकर पहले कभी कोई चेतावनी नहीं दी गई?
जोशीमठ में भले ही आज भू-धसांव की घटनाएं सामने आई हों लेकिन इसकी चेतावनी 50 साल पहले दे दी गई थी। दरअसल, जोशीमठ पहाड़ों के सदियों पुराने मलबे पर बसा है। ये शुरू से ही दरक रहा है। उत्तराखंड जब यूपी का हिस्सा था, तब इसकी जांच के लिए पहली बार 1976 गढ़वाल के आयुक्त रहे एससी मिश्रा की अध्यक्षता में एक 18 सदस्यीय समिति गठित की गई थी। मिश्रा समिति ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की थी कि जोशीमठ धीरे-धीरे धंस रहा है। 
भू-धंसाव रोकन के लिए भी क्या कोई सिफारिश की गई थी? 
मिश्रा समिति ने भूस्खलन और भू-धंसाव वाले क्षेत्रों को ठीक कराकर वहां पौधे लगाने की सलाह दी थी। इसके साथ ही समिति ने कहा था कि स्थल की स्थिरता की जांच करने के बाद ही क्षेत्र में आगे का निर्माण किया जाना चाहिए और ढलानों पर उत्खनन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
खुदाई या विस्फोट से कोई बोल्डर नहीं हटाया जाना चाहिए और भूस्खलन क्षेत्र पर कोई पेड़ नहीं काटा जाना चाहिए। विशेष रूप से मारवाड़ी और जोशीमठ के बीच के क्षेत्र में व्यापक वृक्षारोपण कार्य शुरू किया जाना चाहिए और ढलानों पर जो दरारें विकसित हुई हैं, उन्हें सील कर दिया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहाड़ी की तलहटी पर लटकने वाले शिलाखंडों को उचित सहारा दिया जाना चाहिए और नदी प्रशिक्षण के उपाय किए जाने चाहिए।
मौजूदा दौर में भी क्या इसे लेकर कोई रिपोर्ट आई है?
जून 2022 में गढ़वाल विवि के वैज्ञानिकों के अध्ययन में जोशीमठ शहर की भूवैज्ञानिक नींव की अस्थिरता को लेकर चौंकाने वाला तथ्य सामने आया था। अध्ययन में कहा गया था कि अगर शहरीकरण, चारधाम ऑल वेदर रोड और जल विद्युत परियोजना के निर्माण कार्यों को विशेषज्ञता के साथ न किया गया तो आने वाले समय में जोशीमठ धंस जाएगा। वैज्ञानिकों ने स्थानीय लोगों के अनुरोध पर सर्वे करते हुए यह रिपोर्ट दी थी।

सर्वेक्षण में वैज्ञानिकों ने पाया था कि जोशीमठ के आसपास के इलाकों में तेजी से शहरीकरण बढ़ने के साथ ही निर्माण कार्य हो रहे हैं। रैणी आपदा के बाद यहां पहले से काफी भूगर्भीय हलचल है। ऊपर से चारधाम यात्रा मार्ग का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।
वैज्ञानिकों ने कहा था कि ऑल वेदर रोड में हेलांग और मारवाड़ी के बीच के 20 किलोमीटर हिस्से में तेजी से काम हो रहा है लेकिन मानकों का ख्याल नहीं रखा जा रहा। यहां चारधाम सड़क का निर्माण विशेष उपचार के बाद ही होना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना से भी इस इलाके को खतरा है।  
 वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में कहा है कि तत्काल यहां विशेष ध्यान देते हुए नियंत्रित निर्माण होने चाहिए, नहीं तो आने वाले समय में जोशीमठ धीरे-धीरे धंसने लगेगा।
वैज्ञानिकों की टीम का कहना था कि कई जगहों पर काफी सख्त पत्थर हैं, जिन्हें गलत तरीके से तोड़कर निर्माण कार्य किए जा रहे हैं। भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं। लोगों के घरों में दरारें आने लगी हैं। मलबा, गलत तरीके से खुदाई और पत्थर हटाने की प्रक्रिया जोशीमठ के अस्तित्व पर भारी साबित हो रही है।
आगे इसका खतरा और दायरा कितना बढ़ सकता है?
जोशीमठ से भारत-तिब्बत सीमा महज 100 किलोमीटर दूर है। भू-धंसाव का क्षेत्र सैन्य क्षेत्र और आईटीबीपी के मुख्यालय की ओर बढ़ना शुरू हो गया है। सैन्य क्षेत्र में जाने वाली सड़क भी धंसनी शुरू हो गई है। जोशीमठ में भारतीय सेना का ब्रिगेड मुख्यालय और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की एक बटालियन तैनात है। जोशीमठ भारत-तिब्बत सीमा (चीन के अधिकार क्षेत्र)  का अंतिम शहर है। यहां से नीती और माणा घाटियां भारत-तिब्बत सीमा से जुड़ती हैं। भू-धंसाव का क्षेत्र बढ़ता रहा तो यहां जवानों का रहना मुश्किल हो जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में देश की सुरक्षा को भई खतरा पैदा हो सकता है।

 

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उत्तराखंड के जोशीमठ में हो रहे भू-धंसाव से स्थिति लगातार बिगड़ रही है। भू-धंसाव ने क्षेत्र के सभी वार्डों को चपेट में ले लिया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पीएमओ लगातार मामले की निगरानी कर रहा है। अब तक 70 परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया जा चुका है।  

तेजी से हो रहे भू-धंसाव का दायरा भारत-तिब्बत सीमा को ओर बढ़ने लगा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भू-धंसाव की घटना पर जल्द ही प्रभावी रोक नहीं लगी तो ये देश की सुरक्षा को भी खतरा पैदा कर सकता है। 

आखिर जोशीमठ कहां स्थित है? जोशीमठ में भू-धंसाव का मामला क्यों चर्चा में आया है? किन कारणों से भू-धसांव हो रहा है? क्या भू-धंसाव को लेकर कोई चेतावनी थी? आगे इसका खतरा और दायरा कितना बढ़ सकता है? आइये जानते हैं…

 



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