kali puja 2022: कालरात्रि कहलाती है आज की रात, जानें काली की पूजा को लेकर क्या कहते हैं मिथिला के पंडित

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पटना. सनातन धर्म के दो संप्रदायों के लिए आज का दिन विशेष महत्व रखता है. वैष्णवों के आराध्य विष्णु अवतार राम आज वनवास खत्म कर अयोध्या लौटे थे, जिसके उपलक्ष्य में दीपावली मनायी जाती है. वहीं साक्त संप्रदाय के लिए आज का दिन काली की आराधना का दिन है. आज के दिन ही शिव ने अपने सत्याग्रह से काली को शांत किया था. महिषासुर के रक्तबीजों से दुखी धरती पर सुख और शांति कायम हुई थी.

शिव की संहारिणी शक्ति आद्या काली की उत्पत्ति पर्व

वर्ष में न महत्त्वपूर्ण रातें मानी गयी हैं मोहरात्रि, महारात्रि एवं कालरात्रि. भाद्रकृष्ण अष्टमी की रात्रि मोहरात्रि है. इस विशिष्ट मोहरात्रि में कृष्ण तथा महामाया की उत्पत्ति होती है. महारात्रि आश्विन नवरात्र की महाष्टमी की रात्रि कहलाती है. तीसरी विशिष्ट रात्रि है. कालरात्रि यानी दीपावली की रात, इसमें शिव की संहारिणी शक्ति आद्या काली की उत्पत्ति मानी गयी है. इस अवसर पर काली की उपासना सभी लोग, जात-पाँत से ऊपर उठकर, करते हैं.

करोड़ों योगिनियों के साथ इस रात उत्पन्न हुई थीं काली

विश्वसार तंत्र में कहा गया है कि

“कार्त्तिके कृष्णपक्षे तु पञ्चदश्यां महानिशि।

आविर्भूता महाकाली योगिनीकोटिभिः सह॥

काली आराधना के संबंध में साक्त संप्रदाय के ज्ञाता पंडित भवनाथ झा कहते हैं कि बृहद्धर्मपुराण में कहा गया है कि कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को काली की उत्पत्ति थी, अतः इस उपलक्ष्य में आधी रात में पूजा करनी चाहिए. रुद्रयामल तन्त्र में कहा गया है कि कार्तिक अमावस्या की रात्रि में जिस काली की पूजा होती है, वह विद्या के स्वरूप में प्रसन्न होकर उत्तम बुद्धि प्रदान करतीं है. अतः मिट्टी की मूर्ति बनाकर पद्धति के अनुसार विधान से काली की पूजा करनी चाहिए.

आधी रात में करनी चाहिए काली पूजा

इस संबंध में पंडित भवनाथ झा कहते हैं कि इस वर्ष 24 की पूरी रात अमावस्या तिथि है. पूरी रात्रि अमावस्या तिथि है अतः आज की रात्रि काली पूजा का योग है. यह पूजा रात में ही होती है और सूर्योदय से पहले विसर्जन मूर्ति विसर्जित कर देने विधान है. रात्रि में चक्रपूजा, जो आवरण पूजा है, उसमें देवी के चारों ओर यन्त्र पर अवस्थित योगिनियों की पूजा अंग देवता, परिवार देवता तथा आवरण देवता के रूप में होती है.

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