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इसी दौरान आग की लपटों से घिरी झोपड़ी ढह गई। झोपड़ी में मौजूद मां बेटी के पुतले दब गए। आग इतनी तेजी से फैली की अंदर मौजूद पुतले जल गए। न बचने का मौका मिला और न बाहर मौजूद लोग उन्हें बचा सके। टीम ने वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की। प्रारंभिक तौर पर यह बात सामने आई है कि आग झोपड़ी के अंदर से लगी।
अंदर मौजूद लोगों को न बचने का मौका मिला और न बाहर मौजूद लोगों को बचाने का समय। विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम इंचार्ज प्रवीण कुमार श्रीवास्तव और एसआईटी टीम के सीओ विकास जायसवाल की मौजूदगी में यह क्राइम सीन दोहराया गया।
हूबहू चालहा जैसी झोपड़ी तैयार की गई। जनरेटर सेट रखा गया। बुलडोजर भी मौजूद रहा। झोपड़ी के अंदर मां बेटी के पुतले खड़े किए गए। वास्तविक घटना के समय ही झोपड़ी में आग लगाई गई। इसके बाद तत्काल बुलडोजर से जलते छप्पर को हटाने का प्रयास किया गया। इधर बुलडोजर के छप्पर हटाने के प्रयास पर आग भड़क गई।
धू-धूकर जलती झोपड़ी ढह गई और अंदर मां बेटी के पुतले दबकर जल गए। विशेषज्ञों ने इस दौरान हर बिंदु को परखा और पल पल की वीडियोग्राफी व फोटोग्राफी कराई। अब इन फोटो और वास्तवित घटना के फोटो के विश्लेषण से एसआईटी सही नतीजे पर पहुंचेगी।
तेरह सदस्यीय टीम ने दोहराया सीन
फोरेंसिक टीम में लखनऊ के वैज्ञानिक डॉक्टर सुधीर कुमार व कानपुर के पीके श्रीवास्तव ने 13 सदस्यीय टीम के साथ मड़ौली में घटी घटना को दोहराने की प्रक्रिया की। वैसे तो पूरी प्रक्रिया करीब चार घंटे चली, लेकिन झोपड़ी में आग लगने और अन्य स्थिति के आंकलन को लेकर सीन दोहराव में करीब एक घंटा लगा।
सीन दोहराव में नहीं रहे परिजन
मड़ौली मामले में एसआईटी के क्राइम सीन दोहराव में परिजन नहीं बुलाए गए थे। पहले तो मीडिया को वहां से काफी दूर कर दिया गया। लेकिन पुलिस अधीक्षक कानपुर देहात के आदेश के बाद पत्रकारों को कुछ दूरी से सीन दोहराव को देखने और फोटो खींचने दी गई।
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