[ad_1]

सीमा प्रधान, अतुल प्रधान व शाहिद मंजूर
विस्तार
मेरठ महापौर प्रत्याशी पद के लिए ओवैसी की पतंग ने सपा की साइकिल को पंक्चर कर दिया। मुस्लिम बहुल इलाकों में पतंग ऐसी उड़ी कि आखिर तक साइकिल रफ्तार ही नहीं पकड़ सकी। मुस्लिमों के अलावा दलितों का भी सपा को ज्यादा साथ नहीं मिला। रालोद और आजाद समाज पार्टी से गठबंधन का भी खास फायदा नहीं हुआ। इसकी वजह यह भी रही कि रालोद मुखिया चौधरी जयंत और आसपा प्रमुख चंद्रशेखर आजाद प्रचार करने नहीं आए।
महापौर सीट पर मेरठ में सपा का पलड़ा हमेशा कमजोर ही रहा है। कभी भी सपा का महापौर नहीं बना। पूर्व महापौर पिछली बार जब चुनाव जीती थीं तो वह बसपा में थीं। बाद में उन्होंने सपा का दामन थामा था। तब मुस्लिमों ने हाथी की सवारी की थी। साल 2006 में महापौर पद पर सपा समर्थित लीलावती की जमानत जब्त हुई थी। साल 2012 में सपा समर्थित महापौर प्रत्याशी रफीक अंसारी (शहर विधायक) हारे थे। साल 2017 में महापौर प्रत्याशी दीपू मनोठिया हारीं। इस बार महापौर में फिर इतिहास दोहराया गया है।
इस बार नगर निगम चुनाव में अपनी अहमियत दिखाने के लिए सपा के महापौर प्रत्याशी पद पर साइकिल छोड़ मुस्लिमों ने एआईएमआईएम को जमकर वोट किया। नतीजतन, अधिकांश मुस्लिम इलाकों में साइकिल रेंगती नजर आई।
यह भी पढ़ें: Muzaffarnagar News: गठबंधन रहा असरदार, बिखराव से खिसका भाजपा का जनाधार
[ad_2]
Source link