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मोहर्रम का जुलूस (सांकेतिक)
विस्तार
करीब छह सदी से अधिक पुराना है काशी में मुहर्रम पर निकलने वाला दूल्हे का जूलूस। अंगारों पर चलता हुआ, ताजियों को सलामी देता हुआ। साथ ही मजहबी दीवारों को तोड़ता हुआ। मान्यता ऐसी कि मुसलमानों के साथ हिंदू भी इस जुलूस को प्रति आस्था रखते हैं, इसे देखने के लिए जुटते हैं। आज शुक्रवार की देर रात नौवीं मुहर्रम को दूल्हे का ये कदीमी जुलूस शिवाला से उठेगा। क्या शिया, क्या सुन्नी, इस दूल्हे के जुलूस की जियारत को हिंदू भी पूरी आस्था के साथ उमड़ेंगे, मन्नतें मांगेंगे।
कहते हैं गंगा किनारे जंगल में घोड़े की नाल मिली थी जिस पर हजरत इमाम हुसैन के भतीजे हजरत कासिम के खास निशान बने थे। नाल शिवाला में लाकर रख दी गई और तब से ही शिवाला से हर साल मुहर्रम पर दूल्हे का जुलूस निकलता है। लोग मानते हैं कि जैसे जुलूस में दूल्हे के सिर पर ये नाल रखी जाती है, उस पर सवारी आ जाती है, तब वह आम इंसान से बेहद पाक हो जाता है। इस जुलूस में एक लाख से अधिक लोग शरीक होते हैं। इसकी खासियत यही है कि पूरी दुनिया में इकलौता दूल्हे का जुलूस काशी में ही उठता है।
ऐसे शुरू हुआ दूल्हे का जुलूस
मान्यता है कि करीब 650 साल पहले एक ब्राह्मण जंगल से होकर गुजर रहे थे। उन्होंने जंगल में ‘या हुसैन या हुसैन’ की आवाज सुनी। ढूंढने पर उन्हें वहां घोड़े की एक नाल मिली जिसमें से वो आवाज आ रही थी। वो ये देखकर खासा हैरान हुए। बड़ी हिम्मत कर वो वहां से नाल ले आए और शिवाला के मुसलमानों को दे दिया। शिवाला के आलिम हुसैन रिजवी बताते हैं कि नाल पर जो निशान मिले थे वो इमाम हसन के बेटे हजरत कासिम के माने जाते हैं।
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