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मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू।
– फोटो : अमर उजाला
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मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने गुरुवार को शिमला में कहा कि कांगड़ा चाय यूरोपीय संघ में संरक्षित भौगोलिक संकेतक (जीआई) के रूप में पंजीकृत होने वाला देश का दूसरा उत्पाद बन गया है। उन्होंने कहा कि इससे कांगड़ा चाय के उत्पादकों के लिए यूरोपीय देशों में बिक्री का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सुक्खू ने कहा कि यूरोपीय बाजारों में उत्पाद की गुणवत्ता, वास्तविकता और प्रतिष्ठा को पहचानने के लिए कांगड़ा चाय का यूरोपीय संघ के तहत पंजीकरण महत्वपूर्ण साबित होगा। इसके पंजीकरण से कांगड़ा चाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, जो इसकी बिक्री के लिए वरदान साबित होगा।
गुरुवार को जारी बयान में सुक्खू ने कहा कि इस निर्णय से कांगड़ा जिले के पालमपुर, बैजनाथ, कांगड़ा, धर्मशाला, मंडी जिले के जोगिंद्रनगर और चंबा जिले के भटियात क्षेत्र के ‘कांगड़ा चाय’ उत्पादकों को लाभ होगा। कहा कि कांगड़ा चाय अपने अनूठे स्वाद के लिए विश्व में प्रसिद्ध है। इसमें प्रचुर मात्रा में मौजूद पाइराजिन इसे अलग सुगंध देता हैै। इसके अतिरिक्त इसमें औषधीय गुण भी पाए जाते हैं, जो एंटीऑक्सिडेंट्स, फेनोलिक कंपाउंड, ट्रिप्टोफैन, अमीनो एसिड्स, थीनाइन ग्लूटामाइन और कैटेचिन से मिलते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांगड़ा चाय को वर्ष 2005 में पंजीयक भौगोलिक संकेतक चेन्नई की ओर से जीआई का दर्जा दिया गया था और अब यूरोपीय संघ के साथ पंजीकरण के बाद कांगड़ा चाय की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है। इससे राज्य के कांगड़ा चाय उत्पादकों को लाभ होगा।
सुक्खू ने कहा कि वर्तमान सरकार हिमाचल के पारंपरिक उत्पादों को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। स्थानीय कारीगरों और बुनकरों को लाभ पहुंचाने के लिए कई नवीन पहल की गई है। कुल्लू शॉल, चंबा रुमाल, किन्नौर शॉल, कांगड़ा पेंटिंग, लाहौल के ऊनी मोजे, दस्ताने आदि सहित राज्य के करीब 400 से अधिक पारंपरिक उत्पादों को आज जीआई का दर्जा प्राप्त है। हिमाचली टोपी, सिरमौरी लोईया, मंडी की सेपुबड़ी, चंबा धातु शिल्प, किन्नौरी सेब और किन्नौरी आभूषणाें को जीआई का दर्जा देना पंजीयक भौगोलिक संकेतक चेन्नई के पास विचाराधीन है। सुक्खू ने यूरोपीय संघ के साथ कांगड़ा चाय के पंजीकरण की कठिन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए हिमाचल प्रदेश विज्ञान प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद के प्रयासों की सराहना की।
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