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Lok Sabha Election
– फोटो : अमर उजाला
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इंडिया का प्रत्याशी सपा और कांग्रेस का साझा होने के कारण विपक्ष इस चुनाव में पहले से मजबूत रहेगा। वर्ष 1996 से लेकर पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़ों का जायजा लिया जाए तो यही संकेत मिलते हैं।
पिछले लोकसभा चुनावों में बसपा प्रत्याशियों को बहुत अधिक मत नहीं मिले हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों का जो थोड़ा-बहुत वोट मिलता रहा है, उसके इस बार खिसकने की आशंका है। सपा और कांग्रेस के अलग-अलग प्रत्याशी होने की वजह से अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग का वोट बंट जाता था।
इस बार यह बंधा रहेगा। हालांकि आंकड़े गवाही देते हैं कि जिस चुनाव में भाजपा जीती है, उसने सपा और कांग्रेस के कुल वोटों से अधिक वोट पाए हैं। सात लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक, अगर सपा और कांग्रेस के मतों को जोड़ा जाए तो तीन बार दोनों दलों के कुल मत भाजपा के मतों से अधिक हैं।
चार बार भाजपा को दोनों दलों के कुल मतों से अधिक मत मिले हैं। सपा और कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक से कुछ मत बसपा में भी गए, लेकिन उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं है। प्रत्येक लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग का वोट सपा और कांग्रेस में ही अधिक बंटा है।
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