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जम्मू कश्मीर में लोकसभा चुनाव
– फोटो : अमर उजाला
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प्रदेश में 75 साल से खेती राजनीतिक हाशिये पर है। किसान वोट बैंक की तरह इस्तेमाल तो हो रहे हैं और हर चुनाव में नेता वोटों की फसल भी काट रहे हैं लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है। कश्मीर संभाग में बागवानी पर फिर भी किसी हद तक सरकारों का ध्यान रहा है लेकिन जम्मू संभाग में होने वाली परंपरागत फसलों गेहूं, धान की खेती पर अधिक ध्यान केंद्रित नहीं हुआ।
नतीजन न तो यहां सिंचाई के पर्याप्त साधान हैं और न ही सालों पुरानी स्थायी मंडी की मांग पूरी हो पाई है। हर साल फसल कटाई के वक्त खेतों में अस्थायी मंडियां खोली जाती हैं जिनमें दिक्कतों की भरमार रहती है। किसानों की तरफ ध्यान नहीं देने से किसानों के बच्चे खेती से किनार कर रहे हैं। यही कारण है कि प्रदेश में 2009-10 में 987410 हेक्टेयर में खेती थी जो अब 886770 हेक्टेयर में सिमटकर रह गई है। अभी तक करीब एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा खेती का दायरा कम हो चुका है।
खेती का रकबा घटने का एक बड़ा कारण जम्मू संभाग के कंडी इलाकों में जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाना भी है। किसान जंगली जानवारों से फसलों को बचाने की लंबे समय से मांग कर रहे हैं लेकिन इसका भी समय की सरकारें कोई स्थायी हल नहीं निकाल पाईं। कंडी में आज भी 60 फीसदी हिस्से में सिंचाई का उचित प्रबंध नहीं है। किसान आज भी खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं। मेहनत करने के बावजूद भी फसल पैदावार अच्छी नहीं होती। कई किसान भूमि को बेचकर अन्य धंधों में जा रहे हैं।
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