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यमुना
– फोटो : amar ujala
विस्तार
यमुना को 2025 तक प्रदूषण से मुक्त करने के लिए नई योजना तैयार की गई है। इसके तहत बड़े नालों का पानी नदी में गिरने से पहले शोधित किया जाएगा। इसके लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की जगह प्राकृतिक तरीके से नाले की सफाई होगी। इसमें नजफगढ़, सप्लीमेंट्री और शाहदरा ड्रेन में 9-10 जगहों पर ट्रीटमेंट जोन बनेंगे। इसमें पानी रोकने के लिए छोटे बांध बनाने के साथ पानी साफ करने वाली वनस्पतियों से भरी नम भूमियां बनाई जाएंगी। साथ ही, नाले के पानी के फॉस्फेट को कम करने के लिए केमिकल डोजिंग होगी। इनके सहारे पानी की गुणवत्ता सिंचाई लायक हो जाएगी।
जल मंत्री सौरभ भारद्वाज के मुताबिक, नालों के पानी की गुणवत्ता बेहतर करने की दिशा में कई तरह से काम हो रहा है। इसी कड़ी में नजफगढ़, सप्लीमेंट्री और शाहदरा ड्रेन के पानी को शोधित करने के लिए अहम पहल शुरू की जा रही है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पिछले साल इन तीनों ड्रेन में अलग-अलग जगहों पर काम हुआ था। नतीजे बेहतर होने से अब तीनों में बड़े स्तर पर काम करने का फैसला लिया गया है। यमुना को प्रदूषित करने वाले नालों की सफाई होते ही यमुना अपने आप साफ होने लगेगी। साथ ही केजरीवाल सरकार की यह पहल कारगर साबित होगी।
पायलट प्रोजेक्ट में बने थे छोटे बांध
तीनों नालों पर पिछले साल कई जगहों पर छोटे बांध बनाए गए थे। वहीं, एरिशन सिस्टम और बैंबू फ्लोटिंग वैटलेंट व प्लास्टिक वैटलेंड भी बनाए थे। सरकार को इस पायलट प्रोजेक्ट के बेहतर रिजल्ट देखने को मिले थे। इसी को ध्यान में रखते हुए अब सरकार तीनों ड्रेन में अलग-अलग जगहों पर 9-10 ट्रीटमेंट्स जोन बनाएगी। यहां पर सीवेज के पानी को ट्रीट करने के लिए विभिन्न प्रोसेस दोहराई की जाएगी, ताकि यमुना तक साफ पानी पहुंचे।
पायलट प्रोजेक्ट के नतीजे
पायलट प्रोजेक्ट में नालों के रोहिणी सेक्टर-11, सेक्टर-16 और रोहिणी सेक्टर-15 में बने बांध से पिछले साल नमूने लिए गए थे। इससे पता चला कि अस्थायी बांध-निर्माण के बाद पानी में मौजूद ठोस पदार्थों में कमी आई। रिठाला से रोहिणी सेक्टर-15 के बीच ठोस पदार्थ का स्तर 166 मिलीग्राम प्रति लीटर से घटकर केवल 49 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गया। ये गंदे पानी में अमोनिया की मात्रा में आने वाली भारी कमी की भी जानकारी देता है। रिठाला में अमोनिया का स्तर 26 मिलीग्राम प्रति लीटर था। ये रोहिणी सेक्टर-15 तक आते आते 18 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गया। हर बांध से गुजरने के बाद गंदे पानी में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का स्तर भी कम होता गया।
ये तकनीक होंगी इस्तेमाल
छोटे-छोटे बांध बनेंगे
ट्रीटमेंट जोन में छोटे-छोटे बांध बनाए जाएंगे। इसका मकसद है कि पानी की चाल धीमी हो और उसमें मौजूद सूक्ष्म कण जमीन की सतह पर बैठ जाएं। बांध के ऊपर से साफ पानी ओवर फ्लो होकर आगे बढ़ जाए।
फ्लोटिंग बूम : फ्लोटिंग बूम लगाने से प्लास्टिक वेस्ट को नाले में एक जगह इकट्ठा किया जा सकेगा। इसे बाद में बाहर निकाल लिया जाएगा। इसके अलावा पानी को नाले के अंदर ही साफ करने की इन-सीटू ट्रीटमेंट विधि का इस्तेमाल होगा।
एरिएशन डिवाइस :इस डिवाइस से पानी में आक्सीजन घुलेगी। इससे पानी को और साफ किया जा सकेगा। इस तरह यह पानी प्राकृतिक तरीके से साफ होते हुए यमुना तक पहुंचेगा।
फ्लोटिंग वेटलैंड : फ्लोटिंग वेटलैंड पानी में घुली गंदगी को सोखने का काम करेंगे। इनका निर्माण कम लागत वाले बंबू से होता है। यह सालों तक चलता है। इसके अंदर लगाए जाने वाले पौधे पानी को साफ करने में मदद करेंगे। यह पानी की सतह पर तैरते रहते हैं।
केमिकल का छिड़काव
ड्रेन में केमिकल का छिड़काव होगा। इससे उसके फॉस्फेट में कमी आएगी। असल में नाले के पानी में फॉस्फेट बहुत ज्यादा होता है। इसकी वजह से यमुना में झाग बनता है।
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