गोरखपुर सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दुबे। – फोटो : अमर उजाला।
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जन्मजात विकृति और दिव्यांगता बच्चों को पूरे जीवन भर का दर्द देती है। उस पर अगर परिजन आर्थिक रूप से कमजोर हैं तो उन्हें बच्चों की दिव्यांगता ऐसे चुभती है, जैसे मानों उन्होंने कोई पाप कर दिया हो। ऐसे परिवारों के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके योजना) मरहम साबित हो रहा है। इस योजना का लाभ पाकर ऐसे परिवारों के चेहरे पर मुस्कान बिखर रही है।
सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि कई बच्चों को जन्मजात बीमारियां होती हैं। इस योजना के तहत ऐसी 90 फीसदी बीमारियों का इलाज होता है। यह खर्च 30 हजार से लेकर छह लाख तक होता है। इसके लिए आरबीएसके की मोबाइल टीम 19 ब्लॉक में शहरी और ग्रामीण इलाकों में स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र पहुंचकर पीड़ित बच्चों को खोजती है।
परिवार से उनकी आर्थिक स्थिति पता कर इलाज के लिए सलाह देती है। योजना के तहत बीआरडी मेडिकल कॉलेज से लेकर, निजी अस्पताल, केजीएमयू, एसजीपीजीआई, एम्स जैसे सरकारी और बड़े संस्थानों में ऐसे बच्चों का निशुल्क इलाज कराया जाता है।
सीएमओ ने बताया कि 38 मोबाइल टीम स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों में करीब 4.45 लाख बच्चों की जांच अप्रैल 2022 से दिसंबर 2022 तक की है। इस अवधि में 92 बच्चों के हृदय में छेद, क्लब फुट, क्लब पैलेट आदि की सर्जरी कराई गई। जन्मजात दोषों से युक्त 73 बच्चों का इलाज कराया गया। कार्यक्रम में 44 प्रकार की बीमारियों को चिह्नित कर इलाज करवाने का नियम है।
इनमें न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट, कॉक्लियर इम्प्लांट, फिस्टूला सर्जरी, क्लब फुट, क्लब पैलेट, कुपोषण, दिल में छेद, न्यूरो मोटर इंपियरमेंट, न्यूरो मोटर डिले, हार्मोनल डिसऑर्डर, आई करेक्टिव सर्जरी, विटामिन-डी, रिकेट्स, सैम, टंग आई जैसी बीमारियों का इलाज होता है। शून्य से 19 वर्ष तक के बच्चों का इलाज कार्यक्रम के तहत होता है।
सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने कहा कि गोरखपुर जिले के सभी 19 ब्लॉकों में 38 आरबीएसके टीम प्रतिदिन स्कूल या आंगनबाड़ी केंद्रों का दौरा करती है। अगर किसी का नवजात जन्मजात गूंगेपन और बहरेपन की समस्या से ग्रसित है तो आशा कार्यकर्ता, स्कूल के शिक्षक या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के माध्यम से टीम से संपर्क कर लें। ऐसे बच्चों को निशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
केस- एक भटहट ब्लॉक क्षेत्र के रहने वाले राजेश गुप्ता (38) की बड़ी बेटी जन्मजात न तो सुन सकती थी और न ही वह बोल सकती थी। कई निजी चिकित्सकों को दिखाया, लेकिन हर जगह से सिर्फ लाखों रुपये के काक्लियर इम्प्लांट की सलाह दी गई। बेटी पांच साल की हो गई तो उन्होंने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली में दिखाया। वहां से सलाह मिली कि बच्ची की स्पीच थेरेपी कराएं और उसे डिजीटल हियरिंग मशीन दिलवा दें। आरबीएसके योजना के तहत महंगा डिजीटल हियरिंग मशीन का इंतजाम कर उपलब्ध कराया गया है।
केस-दो पिपरौली ब्लॉक के नौसढ़ निवासी अली असगर (42) का बड़ा बेटा अलकमा आठ माह का हुआ, लेकिन बुलाने पर कोई रिस्पांस नहीं देता था। कई चिकित्सकों को दिखाया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। बेटा पांच साल का हो गया। इस बीच बिटिया अनाया ने भी जन्म लिया। अनाया भी बड़ी हुई तो बेटे वाली ही दिक्कत सामने आई। आरबीएसके योजना के तहत दोनों बच्चों को काक्लियर इम्प्लांट मिला। अब दोनों बच्चे बोलने लगे हैं। इस योजना के तहत पांच साल के अंदर बच्चों को यह प्लांट उपलब्ध कराया जाता है, जो बाजार में काफी महंगा है।
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जन्मजात विकृति और दिव्यांगता बच्चों को पूरे जीवन भर का दर्द देती है। उस पर अगर परिजन आर्थिक रूप से कमजोर हैं तो उन्हें बच्चों की दिव्यांगता ऐसे चुभती है, जैसे मानों उन्होंने कोई पाप कर दिया हो। ऐसे परिवारों के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके योजना) मरहम साबित हो रहा है। इस योजना का लाभ पाकर ऐसे परिवारों के चेहरे पर मुस्कान बिखर रही है।
सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि कई बच्चों को जन्मजात बीमारियां होती हैं। इस योजना के तहत ऐसी 90 फीसदी बीमारियों का इलाज होता है। यह खर्च 30 हजार से लेकर छह लाख तक होता है। इसके लिए आरबीएसके की मोबाइल टीम 19 ब्लॉक में शहरी और ग्रामीण इलाकों में स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र पहुंचकर पीड़ित बच्चों को खोजती है।
परिवार से उनकी आर्थिक स्थिति पता कर इलाज के लिए सलाह देती है। योजना के तहत बीआरडी मेडिकल कॉलेज से लेकर, निजी अस्पताल, केजीएमयू, एसजीपीजीआई, एम्स जैसे सरकारी और बड़े संस्थानों में ऐसे बच्चों का निशुल्क इलाज कराया जाता है।