[ad_1]
किरण सिंह
औरत और शृंगार एक-दूसरे के पूरक हैं. विवाह में मांगलिक रस्म – रिवाजों को निभाने के क्रम में ही युवतियां जब देखती हैं कि देवी-देवताओं से उनके परिजन उनके लिए अखंड सौभाग्य का वरदान मांगते हैं तभी से वे सुहाग के महत्व को समझने लगती हैं. फिर जब गुरहत्थी के रस्म में सोलह शृंगार सामग्री से सजा शृंगार बॉक्स और वस्त्राभूषण ससुराल से चढ़ाया जाता है और उसके बाद सिंदूरदान के रस्म में पिया मांग में सिंदूर भरते हैं, उस क्रम में ही युवतियों के मन के तार पिया से तो जुड़ ही जाते हैं. उसके साथ-साथ सुहाग के प्रतीक चिन्हों से भी उन्हें गहरा जुड़ाव हो जाता है, जिसे स्त्रियां हर हाल में बचाये रखना चाहती हैं. वैसे भी सुहाग के प्रति समर्पण की भावना स्त्रियों को विरासत में मिली होती है, क्योंकि वह अपनी मां, चाची, भाभी आदि को ऐसा करते देखती आयी हैं. इसी समर्पण की भावना से स्त्रियां हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं, जिसमें वह चौबीस घंटे का निराजल उपवास रखती हैं. ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियों का सुहाग अखंडित रहता है. वैसे भी हम अपने देवी-देवताओं का अनुसरण करते आये हैं.
[ad_2]
Source link