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ठुमरी गायन प्रस्तुत करती मालिनी अवस्थी
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
संकटमोचन संगीत समारोह के शताब्दी वर्ष हर मामले में बेहद अनूठा है। परंपरा के आंचल में समय के साथ कदमताल करते हुए सौंवे साल की छठवीं निशा में मालिनी अवस्थी ने अपनी प्रस्तुति पेश की।
तीसरी प्रस्तुति के रूप में संकट मोचन के दरबार में मालिनी अवस्थी ने छोटा ख्याल में एक बंदिश लंका जो धाय गये स्वामी को काज करैं… से गायन की शुरुआत की। इसके बाद राग माझ खमाज में ठुमरी जाग पड़ी मैं तो पीया के जगाने से… फिर इसी राग में दादरा तोहे लइ के संवरिया निकल चलबै… और बलम तोरे झगड़े में रैन गई… से गायन को विराम दिया। उन्होंने दादरा, ठुमरी, होरी के साथ कई सुमधुर प्रस्तुतियां दीं। उनके साथ हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र और तबला पर लंदन निवासी बनारसी संजू सहाय ने प्रभावी संगत की।
तीसरी प्रस्तुति के रूप में संकट मोचन के दरबार में मालिनी अवस्थी ने छोटा ख्याल में एक बंदिश लंका जो धाय गये स्वामी को काज करैं… से गायन की शुरुआत की। इसके बाद राग माझ खमाज में ठुमरी जाग पड़ी मैं तो पीया के जगाने से… फिर इसी राग में दादरा तोहे लइ के संवरिया निकल चलबै… और बलम तोरे झगड़े में रैन गई… से गायन को विराम दिया।
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