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दशाश्वमेध घाट का नजारा
– फोटो : अमर उजाला
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ओहायो गंगा तेरा दे रैन्प्यू ओ तेतो (गुड मार्निंग, गंगा की लहरों पर दीप जलाएं)…। खाटी जापानी बोली सुनकर दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियां उतरते जापानी युगल के कदम एकबारगी ठिठक जाते हैं। हजारों मील दूर परदेस में अपनी बोली की यह संक्षिप्त पुकार कुछ पल के लिए ही सही उन्हें आह्लादित कर जाती है। आगे बढ़ते ही उनकी नजरें निखालिस जापानी अंदाज में कॉर्निश बजा रहे एक विनम्र व्यक्तित्व को अपना स्वागत करते पाती है। झकाझक दक्षिण भारतीय लुंगी में डटा यह शख्स बड़ी ही मनुहार के साथ इस पर्यटक दंपती को अपनी चौकी तक ले जाता है और उनके हाथों से गंगा में दीपदान करवाता है।
ये हैं सुभाष साहनी, जो घाट पर गंगा पूजन के लिए हर रोज ही पुष्प और दीप की डाली सजाते हैं। दस-दस रुपये जोड़कर अपने छोटे से कुटुंब की आजीविका चलाते हैं। शिक्षा के नाम पर अक्षर ज्ञान से भी वंचित सुभाष भइया का कारोबारी गुर है, उनका देश व विदेश की 11 भाषाओं का धारा प्रवाह संवाद।
इसके दम पर वे पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों से पल भर में ही सहज आत्मीय रिश्ता जोड़ लेते हैं और उसे दीप-पुष्प का एक दोना खरीद लेने के लिए हर हाल में राजी कर लेते हैं । बातचीत में पता लगता है कि सुभाष तमिल, तेलुगू, मलयालम, मराठी और कन्नड़, गुजराती के अलावा फ्रेंच, जापानी, हिब्रू, कोरियन और साथ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं।
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